सरगोशियाँ

जो मुझे ज़िन्दा रखती हैं

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उलझी-उलझी ख्वाईशें

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(1)
सालों पहले
“बेवा सी लगती हो तुम। आँखों में काजल लगाया करो। गेसुओं में गजरे सजाया करो। नुमाइश का दौर है, तुम भी दिखावा करो ” मैं उसे अक्सर शिकायती लहजे में चिढ़ाता। और फिर “गुनाहों का देवता ” के सफ़हे पलटने में मशगूल हो जाता। थोड़ा सा पढ़ चुका था और थोड़ा बाकी था। वो मेरे मास्टर साहब की लाडली बेटी थी। शांत, सौम्य, सादगी से पुररौनक चेहरा। मेरी शिकायत पर हलके से मुस्कुरा देती।
ख्वाईशें उसे देख जवां हो रही थी और हसरतें उसे लेकर एक जहां बना रही थी।
(2)
कुछ साल बाद
“बला की खुबसूरत लग रही हो तुम। ठीक सर्द मौसम में छत पर उतरती धूप की तरह। लफ़्ज़ों के समंदर में हसरत-ए -बयान की अनलिमिटेड मौजें उछल-कूद करने लगी हैं। तारीफें अपनी हद पार कर ले तो बुरा न मानना। सच कहता हूं, यूँ लगता है कि जैसे किसी ने चांद के कई टुकडे कर तुम्हारे जिस्म में उतार दिया हो। ” किसी और के नाम की मेहंदी हाथों में सजाये वो दुल्हन के लिबास में बैठी थी। हालाँकि मुझे तुम्हारी सादगी ही पसंद थी। फिर भी मैं बुदबुदाये जा रहा था। दूर कहीं से आवाज़ आ रही थी “जो दिल गँवा चुके तुम उस दिल को ढूंढते हो, इस सादगी के सदके कातिल को ढूंढते हो” “गुनाहों का देवता ” मैंने पूरी पढ़ ली थी। सो तुम्हे थमा दिया ताकि इसे पढ़ने के बाद शायद तुम मेरे भीतर का द्वन्द समझ सको।
मैं तुमसे दूर चला गया। ख्वाईशें दम तोड़ गई और हसरतों का जहां अपनी आख़िरी सांसे लेने लगा।
(3)
सालों बाद
शेल्फ से किताबें निकल रहा था। कोने में दुबक कर बैठी एक किताब पर नज़र पड़ी। उठाकर देखा तो मेरी प्रिय पुस्तक थी “गुनाहों का देवता “…….शायद तुम छोड़ गयी थी। सफ़हें पलटा तो एक चिट मिली थी जिस पर लिख था “मुझे सोलह श्रृंगार करना पसंद नहीं था क्योंकि मैं तुम्हारे साथ थी तो खुबसूरत थी ”
ख्वाईशें कुछ पल के लिए कोमा से बाहर आई और फिर कोमा में चली गई।



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